आयनन विभव, इलेक्ट्रॉन बंधुता किसे कहते है?

हेलो दोस्तो आज इस आर्टिकल में  हम जानेंगे कि आयनन विभव  किसे कहते हैं और इलेक्ट्रॉन बंधुता किसे कहते हैं इनके बारे में हम डिटेल में स्टेप बाई स्टेप जानने वाले हैं तो चलिए बिना समय बर्बाद की शुरू करते हैं।

आयनन विभव किसे कहते हैं? What is Ionisation potential?

आयनन विभव –

इसे आयनन ऊर्जा भी कहा जाता है किसी भी विलगित उदासीन गैसीय परमाणु के मूल अवस्था से एक इलेक्ट्रॉन पृथक करने में जितनी उर्जा की आवश्यकता होती है उसे हुए प्रथम आयनन विभव कहा जाता है अथवा प्रथम आयनन ऊर्जा कहा जाता है इसी प्रकार द्वितीय तथा तृतीय आयनन विभव हो सकते हैं।

M + E1 ————- M+ + 1e

M+ + E2 ———— M+2 + 1e

M+2 + E3 ———– M+3 + 1e

जहां E1 प्रथम आयनन विभव E2 द्वितीय आयनन विभव तथा E3 तृतीय आयनन विभव है

आयनन विभव को वोल्ट में मापा जाता है। E1  से E2  तथा E2 से E3 का मान अधिकतम होता है क्योंकि प्रत्येक बार इलेक्ट्रॉन निकल जाने से नाभिक के आकर्षण बल में वृद्धि होती है फलत: इलेक्ट्रॉन को पृथक करने के लिए अत्यधिक ऊर्जा लगानी पड़ती है

यही कारण है कि E3 का मान सबसे अधिक होता है। जिन तत्वों के अंतिम कक्षा में इलेक्ट्रॉनों की संख्या आठ होती है तो ऐसे तत्वों का आयनन विभव सबसे अधिक होता है जैसे अक्रिय गैसों का  आयनन विभव सबसे उच्च होता है। जैसे  ऑर्गन(Ar) नियान(Ne) इत्यादि।

आयनन विभव किसे कहते है
आयनन विभव किसे कहते है

आवर्त (Period) –

आवर्त सारणी के किसी भी आवर्त में बाएं से दाएं की तरफ चलने पर  परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ-साथ आयनन विभव का मान भी  बढ़ता है क्योंकि नाभिकीय  आवेशों का मान बढ़ता है  तथा परमाणु आकार का मान घटता है जिससे इलेक्ट्रॉनों पर नाभिक का आकर्षण बल बढ़ जाता है जिससे इलेक्ट्रॉन पृथक करने के लिए अधिक उर्जा लगानी पड़ती है। फलत:  आवर्तों में आयनन विभव का मान बढ़ता है।

वर्ग या समूह (group) –

आवर्त सारणी की किसी भी वर्ग में ऊपर से नीचे की तरफ चलने पर परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ-साथ आयनन विभव का मान घटता है क्योंकि वर्गों में ऊपर से नीचे की तरफ चलने पर परमाणु आकार बढ़ता है जिससे इलेक्ट्रॉनों कीसंख्या भी बढ़ती है

इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ने के कारण नाभिक का आकर्षण बल कमजोर हो जाता है। जिससे इलेक्ट्रॉनों को आसानी से पृथक किया जा सकता है अतः स्पष्ट होता है  की वर्गों में आयनन विभव कमान घटता है।

बोरान का आयनन विभव बेरिलियम से कम होता है स्पष्ट कीजिए।

बोरान तथा बेरिलियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न है

4Be = 1s2, 2s2

5B = 1s2, 2s2, 2p1

बेरिलियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास  पूर्ण भरा है  जो कि एक  स्थाई व्यवस्था है। जिससे इलेक्ट्रॉन को पृथक करने के लिए अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी जबकि बोरान का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ना तो अर्ध भरा है ना ही पूरा भरा है अतः यह अस्थाई व्यवस्था है जिससे इलेक्ट्रॉनों को आसानी से पृथक किया जा सकता है यही कारण है कि  बोरान का  आयनन विभव बेरिलियम से कम होता है।

Period II – Li < B < Be < C < O < N < F
आयनन विभव का बढ़ता हुआ क्रम

इलेक्ट्रॉन बंधुता (Electron Affinity) –

किसी तत्व की विलगित उदासीन गैसीय परमाणु में एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर जो ऊर्जा मुक्त होती है उसे ही इलेक्ट्रॉन बंधुता कहा जाता है।

माना की कोई विलगित उदासीन जैसी परमाणु A है।

A + e ———- A + EA

जहाँ EA तत्व की इलेक्ट्रॉन बंधुता है। किसी तत्व की इलेक्ट्रॉन बंधुता जोड़ने पर यह पता चलता है कि तत्व का परमाणु इलेक्ट्रान प्राप्त करके ऋणायन बनाने की कितनी प्रवृत्ति रखता है।

अतः स्पष्ट होता है कि तत्व की इलेक्ट्रॉन बंधुता जितनी अधिक होती है वह उतनी ही आसानी से ऋण आयन बना लेता है इलेक्ट्रॉन बंधुता को भी इलेक्ट्रॉन वोल्ट में मापते हैं।

आवर्त (Period) –

आवर्त सारणी के किसी भी आवर्त में बाएं से दाएं की तरफ चलने पर परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ-साथ एक्ट्रान बंधुता का मान भी बढ़ता जाता है क्योंकि आवर्तों में परमाणु आकार घटता है। नाभिकीय आवेशों का मान बढ़ता है। जब इलेक्ट्रॉनों को प्रवेश कराया जाता है तो वह नाभिक के आकर्षण बल द्वारा आसानी से आकर्षित हो जाता है फलत: इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान बढ़ जाता है।

 वर्ग या समूह (Group) –

आवर्त सारणी कि किसी भी वर्ग में ऊपर से नीचे की तरफ चलने पर  परमाणु क्रमांक बढ़ता है। परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान घटता है क्योंकि वर्गों में कोचों की संख्या बढ़ती है फलत: इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है अतः इलेक्ट्रॉन को प्रवेश कराने में कुरजा लगानी पड़ती है क्योंकि 1 रनों की संख्या अधिक होने के कारण परमाणु में इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है इलेक्ट्रॉनों के नाभिक का आकर्षण कम हो जाता है।   अतः स्पष्ट होता है वर्गों में इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान घटता है।

उत्कृष्ट गैसों की इलेक्ट्रॉन बंधुता शून्य अथवा धनात्मक क्यों होती है?

उत्कृष्ट गैसों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास संतृप्त कोश विन्यास होता है अतः इन में इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है। क्योंकि इनके  कोश पूर्णता भरे होते हैं यदि इन्हें इलेक्ट्रॉन देकर ऋणायन बनाया जाए  तो बाहर से उर्जा  लगानी पड़ती है। यही कारण है कि उत्कृष्ट गैसों की इलेक्ट्रॉन बंधुता शून्य अथवा धनात्मक होती है।

 क्लोरीन की  इलेक्ट्रॉन बंधुता फ्लोरीन से अधिक होती है क्यों?

क्लोरीन के इलेक्ट्रॉन बंधुता फ्लोरीन से अधिक होती है क्योंकि फ्लोरीन परमाणु की परमाणु त्रिज्या कम होती है तथा इलेक्ट्रान घनत्व का मान अधिक होता है जब फ्लोरीन परमाणु में इलेक्ट्रॉन को प्रवेश करा जाता है तो इलेक्ट्रान घनत्व अधिक होने के कारण इलेक्ट्रॉनों के मध्य प्रतिकर्षण बल कार्य करता है जिससे इलेक्ट्रॉन को प्रवेश नहीं कराया जा सकता यही कारण है कि क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बंधुता फ्लोरीन से अधिक होती है।

Cl>F>Br<I इलेक्ट्रॉन बंधुता का बढ़ता हुआ क्रम

प्रथम इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान  ऋणात्मक तथा द्वितीय इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान धनात्मक क्यों लिया जाता है?

किसी विलगित  गैसीय उदासीन परमाणु में एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर जो ऊर्जा मुक्त होती है उसे ही प्रथम इलेक्ट्रॉन बंधुता कहा जाता है।

माना कि  विलगित उदासीन गैसीय परमाणु A है तो – 

A+1e- ……………. A+ऊर्जा

उपरोक्त अभिक्रिया को मानक रूप में लिखने पर –

A+1e- ……… A

Delta H = -ऊर्जा 

Delta H = ऐन्थैल्पी परिवर्तन 

अतः स्पष्ट होता है कि प्रथम इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान ऋणात्मक होता है।

 जब  विलगित उदासीन कैसी परमाणुओं से दूसरा इलेक्ट्रान जोड़ा जाता है  तो जो ऊर्जा लगती है उसे ही  द्वितीय इलेक्ट्रॉन बंधुता कहा जाता है।

A+1e- ………. A-2 – ऊर्जा 

उपरोक्त अभिक्रिया को मानक रूप से लिखने पर 

A+1e- ————- A-2

Delta H = +ऊर्जा 

अतः स्पष्ट होता है कि द्वितीय इलेक्ट्रॉन बंधुता का मान धनात्मक होता है क्योंकि ऋणायन  तथा इलेक्ट्रॉनों के मध्य प्रतिकर्षण को कम करने के लिए बाहर से ऊर्जा लगानी पड़ती है।

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