अलैंगिक प्रजनन Asexual Reproduction in Hindi complete easy

हेलो दोस्तों स्वागत है आपका एक और नये आर्टिकल में, दोस्तों आज हम जानेगे कि अलैंगिक प्रजनन क्या है (What is Asexual Reproduction in Hindi) इसके बारे में स्टेप बाई स्टेप पूरी तरह जानेगे तो चलिए समय बर्बाद न करते हुए शुरू करते है

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अलैंगिक प्रजनन क्या है? (What is Asexual Reproduction in Hindi) –

अलैंगिक प्रजनन में एक अकेले जीव में ही संतान उत्पन्न करने की क्षमता होती है इसके बाद जो संतान उत्पन्न होती है वह सिर्फ एक दूसरे के समरूप ही नहीं; बल्कि अपने जनक के हूबहू या एकदम समान होती है ये आकार में ही नहीं आनुवंशिक रूप से भी समान होती है ऐसे जीव जो आनुवंशिक और अकारिकीय (Genetically ant Morphologically) रूप से एक समान होते है तो ऐसे जीवों को क्लोन कहते है

ये Uniparental होते  है मतलब एक ही जीव माता और पिता दोनों होता है इनमे अर्धसूत्रीविभाजन, निषेचन, आनुवंशिक विभिन्नताए और युग्मक निर्माण की प्रक्रिया नही होती है यह प्रजनन निचला जीवों (Lower Organism) में होता है

अलैंगिक प्रजनन (Asexual Reproduction in Hindi) चार प्रकार से होती है

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  1.  विखंडन (Fission)
  2. मुकुलन (Budding)
  3. खंडन (Fregmentation)
  4. पुनःरुद्धभवन (Regeneration)

चलो अब जान लेते है कि जन्तुओ में अलैंगिक प्रजनन (Asexual Reproduction in Hindi) कैसे होती है

विखंडन (Fission) –

विखंडन ज्यादातर एकल कोशकीय जीवों में देखने को मिलाता है विखंडन का मतलब अलग – अलग भागो में विभाजित होना होता है मतलब एक जीव विभाजन करके नए जीव का बनना ही विखंडन कहलाता है

जैसे – अमीबा एक कोशकीय जीव दो अलग अलग भागो में विभाजित हो जाता है इस प्रक्रिया में जो पहला केन्द्रक होता है वह दो केन्द्रक में विभाजित होता है इस प्रक्रिया को कैरियोकाइनेसिस (Karyokinesis) कहा जाता है उसके बाद कोशिका दो कोशिकाओ में विभाजित हो जाता है इस प्रक्रिया को साइटोकाइनेसिस (Cytokinesis) कहा जाता है अब ये जो विभाजित कोशिकाए होती है इन्हें डॉटर सेल्स या बेटी कोशिकाए कहते है

अब आपके दिमाग में एक प्रश्न उठ रहा होगा कि इन्हें डॉटर सेल्स क्यूँ कहते है संस सेल्स या बेटा कोशिकाए क्यूँ नहीं कहते है क्यूंकि ये कोशिका आगे चलकर दो बेटी कोशिकाओ को जन्म देंगी हमेशा औरते ही बच्चे को जन्म देती है इसलिए इन्हें बेटी कोशिकाए कहा जाता है और विखंडन द्वारा अमीबा, युग्लीना, बैक्टीरिया इत्यादि सूक्ष्म जीव (micro organism) प्रजनन करते है यह दो प्रकार का होता है

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  1. बाइनरी विखंडन (Binary Fission)
  2. बहु विखंडन (Multiple Fission)      

द्विविखंडन (Binary Fission) –

इस विखंडन में एक जीव बराबर – बराबर  दो अलग – अलग कोशिकाओ में बट जाती है इसमें होता क्या है कि पहले जीव का जेनेटिक मैटेरिअल दो भागो में बट जाता है उसके बाद वह दो अलग – अलग कोशिकाओ में विभाजित हो जाता है और हर एक भाग एक वयस्क जीव के रूप में तेजी के साथ ग्रो या वृद्धि कर जाता है इसी को बाइनरी विखंडन कहते है यह तीन प्रकार का होता है

  1. सरल द्विविखंडन (Simple binary fission)
  2. अनुलम्बीय द्विविखंडन (Longitudinal binary fission)
  3. अनुप्रस्थ द्विविखंडन (Transverse binary fission)

जैसे – अमीबा, पैरामीसियम आदि

सरल द्विविखंडन (Simple binary fission) –

इस विखंडन में अनियमित रूप से द्विखंडन होता है मतलब कही से भी टूटकर दो कोशिकाओ में विभाजित हो जाता है ऐसे जीव एक समान कोशिकाओ के बने होते है यह बहुत ही सरल तरीके से हो जाता है इसलिए इसे सरल द्विविखंडन कहते है

Example – अमीबा, एंटअमीबा

अनुलम्बीय द्विविखंडन (Longitudinal binary fission) –

इस द्विविखंडन में जीव अनुलम्बीय रूप में विभाजित होते है इसलिए इसे Longitudinal binary fission कहते है   

Example यूग्लिना, Verticella

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अनुप्रस्थ द्विविखंडन (Transverse binary fission) –

इस बाइनरी फिजन या द्विखंडन में जीव अनुप्रस्थ रूप में विभाजित होते है इसलिए इस क्रिया को अनुप्रस्थ द्विविखंडन कहते है

Example पैरामीसियम, Balantidium  

बहुविखंडन (Multiple Fission) –

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जब जनक विभाजन करके दो से अधिक नए जीवों का निर्माण करते है तो ऐसे प्रक्रिया को बहु विखंडन कहते है इस विखंडन में जब जीव प्रतिकूल परिस्थिति में या यूँ कहे की गंदे पर्यावरण में आ जाता है तो वह खुद को सुरक्षित करने के लिए लेयर्स बनाते है और उसके अन्दर बहु विखंडन करते है मतलब केन्द्रक का बहुत बार विभाजन करते है इन्हें स्पोर भी कहते है और ये स्पोर कोशिका बन जाते है उसके बाद अनुकूल परिस्थिति होने पर लेयर्स टूट जाता है और सभी कोशिकाए बाहर आ जाते है

जैसे – वैसे तो अमीबा बाइनरी विखंडन करता है लेकिन जब अमीबा के ऊपर विपत्ति आती है या गंदे पर्यावरण में आ जाती है तो यह अपने आप को सुरक्षित करने के लिए तीन सुरक्षात्मक लेयरो से घेर लेती है इन लेयर को  पुटी या सिस्ट कहते है इस प्रक्रिया को पुटिभवन या Encystation कहते है

अब अमीबा विकट परिस्थिति में होती है जिसके कारण ज्यादा बच्चो को जन्म देना चाहती है ताकि कोई तो बच जाए इस वजह से यह सिस्ट वाल के अन्दर बहु विखंडन शुरू कर देती है सिस्ट वाल के अन्दर जो स्पोर बनते है उन्हें बीजाणु अमीबाभ या Pseudopodiospores कहते है और यही स्पोर अमीबा बनते है और अनुकूल परिस्थिति होने पर ये सिस्ट वाल टूट जाता है और अमीबा बाहर आ जाते है और इस प्रक्रिया को बीजाणुजनन या Sporulation कहते है     

Asexual reproduction in hindi
Multiple Fission in hindi

मुकुलन (Budding) –

जब जनक के शरीर पर मुकुल या कलिका बनता है और उसके बाद उस कलिका से नये जीव का निर्माण होता है तो इस प्रक्रिया को मुकुलन या बडिंग कहते है बडिंग में छोटी कलिकाए उत्पन्न होती है जो शुरू में जनक कोशिका से जुडी होती है और बाद में अलग होकर नए जीव में परिपक्व हो जाती है बडिंग दो प्रकार का होता है

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उदाहरण – हाइड्रा, यीस्ट आदि  

  1. Exogenous  
  2. Endogenous

Exogonous –

इसे एक्सटर्नल बडिंग कहते है क्योकि इसमें बडिंग शरीर के बाहरी सतह पर होती है जैसे यीस्ट में यह विभाजन एक समान नहीं होता है तथा छोटी कलिका उत्पन्न हो जाती है जो शुरू में जनक कोशिका से जुडी रहती है और बाद में अलग हो कर नए यीस्ट जीव में परिपक्व हो जाती है इसी तरह हाइड्रा में बगल से कलिकाए निकलती है और बाद में विभाजित होकर एक परिपक्व हाइड्रा बन जाती है

उदहारण हाइड्रा यीस्ट आदि   

Endogenous –

इसमें आन्तरिक बडिंग या इंटरनल बडिंग होता है जब जनक के अन्दर कलिकाए बनती है तो इन कलिकाओ से नए जीव का निर्माण होता है तो इस प्रक्रिया को अन्तः मुकुलन कहते है

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 जैसे – स्पंज के अन्दर कलिकाए बनती है जिसे Gemmule कहते है ऐसे स्पंज के अन्दर बहुत से जेम्म्युल बनते है जिन्हें Archeocyte cell कहा जाता है यही कोशिका अनुकूल परिस्थिति होने पर बाहर निकलकर नये स्पंज बन जाते है इन कोशिकाओ के पास नए कोशिका उत्पन्न की क्षमता होती है इस प्रक्रिया को हो अन्तः मुकुलन कहते है

Fragmentation –

इसमें जीव का शरीर अलग – अलग टुकड़ो में टूट जाता है क्योकि इनका शरीर संरचना बहुत ही सरल होता है इसलिए आसानी से टूट जाते है और यह शरीर का टुकड़ा व्यक्तिगत रूप से एक नया जीव बन जाता है तो इस प्रक्रिया को फ्रेगमेंटेशन कहते है

उदाहरण – Planaria, Protonema, Filamentous algae

पुनःरुद्धभवन Regeneration –

पुनःरुद्धभवन एक नेचुरल प्रक्रिया है जिसमे जीव के शरीर का कोई भाग जैसे – कोशिका, ऊतक, अंग आदि डैमेज या खराब होने के बाद फिर से उसकी मरम्मत, पुनःनिर्माण, या पुनःभरण की क्रिया को Regeneration या पुनःरुद्धभवन कहते है

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पुनःरुद्धभवन के प्रकार (Type of Regeneration in Hindi) –

पुनःरुद्धभवन दो प्रकार के होते है

  1. अभिरुपांतरण (Epimorphosis)
  2. Morphollaxis

अभिरुपांतरण (Epimorphosis) –

इसमें केवल शरीर का टूटा भाग पुनः विकसित हो जाता है न कि शरीर से टूटा हुआ भाग नए जीव के रूप में विकसित हो जाता है यह क्रिया उच्चतम जीवों में होता है  

जैसे – छिपकली की पूँछ कट जाने के बाद पुनः एक नई पूंछ विकसित हो जाती है लेकिन कटा हुआ पूँछ पुनः छिपकली नही बनता है इसी तरफ तारा मछली की आर्म या बाजु कट जाने पर पुनः विकसित हो जाती है

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उदहारण – Lizard, Starfish आदि

Morphollaxis –

इसमें भी शरीर का कटा भाग पुनः विकसित हो जाता है लेकिन इसमें शरीर से कटा हुआ भाग एक नया जीव बन जाता है यह क्रिया सूक्ष्म जीवों या निम्नतम जीवों में होता है

जैसे – यदि हाइड्रा बीच से कट जाता है तो हाइड्रा का सिर वाला भाग निचले भाग को पुनः विकसित कर लेता है और जो कटा हुआ निचला भाग होता है वह ऊपर के भाग को यानि की सिर को विकसित करके नया जीव हाइड्रा बन जाता है

उदहारण – Hydra, Planaria आदि

कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) –

यह अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction in Hindi) की वह विधि है जिसमे पौधे के शरीर के किसी भी कायिक भाग (पुष्प को छोड़कर) से नए पौधे का विकास होता है इस क्रिया को कायिक प्रवर्धन कहते है

कायिक प्रवर्धन के प्रकार (Type of Vegetative Propagation) –

यह दो प्रकार का होता है

  1. प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन (Natural Vegetative Propagation)
  2. कृत्रिम कायिक प्रवर्धन (Artificial Vegetative Propagation)
प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन (Natural Vegetative Propagation) –

पौधों में कायिक अंगो से कलिकाए विकसित होकर नए पौधों का निर्माण करती है, अतः पौधों में स्वतः होने वाले जनन को प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन कहते है अब यह क्रिया पौधों के कई अंगो द्वारा हो सकता है

यह कायिक प्रवर्धन निम्न अंगो द्वारा होता है

  • तने द्वारा (By Stem)
  • जड़ो द्वारा (By Roots)
  • पत्तियों द्वारा (By Leaf)

सबसे पहले हम जान लेते है कि तने द्वारा कैसे किया जाता है

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तने द्वारा (By Stem) –

 इसमें क्या होता है कि इनकी पर्व संधियों पर स्थित कलिकाए नए पौधे को जन्म देती है

उदाहरण –

भूमिगत तने –

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इसके अन्तर्गत आलू, अदरक, हल्दी आदि आते है आलू क्या है आलू कंद है आलू में छोटी – छोटी आंखे होती है इसे प्रवह सन्धियाँ कहते है जब हम मिट्टी के अंदर आलू को बोये देते है तो इनसे नए पौधे का निर्माण हो जाता है

इसी तरह अदरक और हल्दी क्या है प्रकंद और राइजोम है इनमे भी प्रवह सन्धियाँ होती है इन्हें भी मिट्टी के अन्दर बो देने पर इनसे भी नए पौधे का निर्माण हो जाता है

इसी के अन्दर जिमीकंद आ जाता है जिमीकंद क्या होता है जिमीकंद घनकन्द होता है इसी तरह प्याज और लहसुन होता है प्याज और लहसुन क्या होता है यह शल्ककंद होता है

अर्धवायुवीय तने –

इसके अंतर्गत दूब घास आ जाते है यह ऊपरिभूस्तारी होते है मतलब भूमि के ऊपर भूमि से चिपककर वृद्धि करते है

इसमें जलकुम्भी भी आता है यह भूस्तारीका होता है इसे बंगाल का आतंक भी बोला जाता है इसमें वृद्धि बहुत तेजी से होता है फिर पुदीना आ जाता है पुदीना क्या होता है यह अन्तः भूस्तारी होता है फिर आ जाता है स्ट्राबेरी यह भूस्तारी होता है

अब हम बात करेंगे वायवीय तने के बारे में –

वायवीय तने –

 इसके अंतर्गत गन्ना और अमरबेल आ जाता है इसे भी तने से उगाया जाता है

अभी तो हम लोगो ने तने के द्वारा के बारे में अध्ययन किया अब बात कर लेते है जड़ो के द्वारा कैसे होता है

जड़ो द्वारा –

 इसके अंतर्गत जो डहेलिया और शकरकंद होती है इनकी जड़ें भोजन इकट्ठा करके फूल जाती है और सुप्तावस्था में चली जाती है इन पर लगी अपस्थानिक कलियां अगले जनन काल में नए पौधे को जन्म देती है

ये तो हो गया जड़ो के द्वारा अब बात कर लेते है पत्तियों के द्वारा कैसे होता है

पत्तियों द्वारा –

इसमें कुछ पौधों में पत्तियां भोजन का संग्रहण करती है जिससे उन पर नई कलिकाए बनकर नए पौधों को जन्म देती है

उदाहरण – ब्रायोफिल्म (पत्थरचट्टा)

अभी तक तो हम लोगो ने प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन के बारे में जान लिया है अब हम लोग बात करेंगे कृत्रिम कायिक प्रवर्धन के बारे में

कृत्रिम कायिक प्रवर्धन (Artificial Vegetative Propagation) –

इसके अंतर्गत जब द्वारा निर्मित पद्धतियों का प्रयोग करके एक नये पौधे से कई नये पौधे को विकसित किया जाता है तो उसे कृत्रिम कायिक प्रवर्धन कहते है

कृत्रिम कायिक प्रवर्धन की विधियां –

इसकी तीन विधियां है

  1. कर्तन (Cuttings)
  2. दाब लगाना (Layering)
  3. रोपण (Grafting)

सबसे पहले हम कटिंग के बारे में बात कर लेते है

कर्तन (Cuttings) –

इस विधि में पौधे का कोई भी छोटा हिस्सा (तना, पत्ती, जड़) जिस पर अंकुर लगा हो, को काटकर और उसे मिट्टी और पानी की सुविधा देकर एक नया पौधा उगाया जाता है

तना कर्तन (Stem Cutting) –

इस विधि में पौधे के तने को छोटे टुकड़ो में काट कर जमीन में रोप दिया जाता है

जैसे – गुलाब, अंगूर, गन्ना आदि

जड़ कर्तन (Root Cutting) –

इस विधि में जड़ के टुकड़ो को ऊधर्व स्थिति में लगाया जाता है ताकि शीर्ष पर उपस्थित अपस्थानिक कलिकाएँ प्रस्फुटित हो सके और नये पौधे का निर्माण हो सके

उदाहरण – अमरुद, चेरी, नींबू, सेव आदि

अब हम बात करेंगे दाब लगाना के बारे में –

दाब लगाना (Layering) –

इस विधि में तना या जड़ को मुख्य पौधे से बिना अलग किये उसमे अपस्थानिक जड़ो के निर्माण को प्रेरित किया जाता है जिनसे नये प्ररोह निकलते है उसके बाद इसे उस पौधे से अलग करके नए स्थान पर लगा देते है जिससे एक नये पौधे का निर्माण हो जाता है

इसकी दो विधियां होती है चलो इनके बारे में भी जान लेते है

टीला दाब (Mound Layering) –

इस विधि में तने की झुकी हुई शाखा को जमीन में दाब दिया जाता है (कम से कम एक पर्वसंधियाँ जमीन में दब जाए) कुछ समय बाद जमीन में गड़े तने की पर्वसंधियों से अपस्थानिक जड़े निकलने लगती है सही समय पर इस शाखा को पौधे से काटकर मिट्टी के पिंड सहित अलग कर लिया जाता है उसके बाद इस एक नई जगह पर लगा दिया जाता है जिससे एक नये पौधे का निर्माण हो जाता है

उदहारण – चमेली, मोगरा आदि

वायुदाब लगाना (Air layering) –

इस विधि का प्रयोग वृक्षों में किया जाता है जिनकी शाखाये मोटी होती है शाखा के स्वस्थ भाग पर चारो ओर से छाल को हटाकर उस भाग पर गीली मिट्टी या गीली रुई से ढक देते है, जो इस भाग को नम रखता है इस ढके हुए भाग को “गुट्टी” कहते है गुट्टी पर एक पात्र द्वारा बूँद – बूंद पानी देते है चार से आठ सप्ताह के बाद इस पर जड़े दिखाई देती है फिर इस भाग को अलग करके मिट्टी में लगा दिया जाता है जिससे एक नये पौधे का निर्माण हो जाता है

अब हम लोग बात करेंगे रोपण के बारे में तो चलिए शुरू करते है

रोपण (Grafting) –

इस विधि के अन्दर दो अलग – अलग पौधों के तने को काट लिया जाता है और इस प्रकार जोड़ा जाता है कि वे एक पौधे के रूप में विकसित हो, काटे गये दोनों तनों में से एक तने में जड़े होती है जिसे “Stock” कहते है और दूसरा तना बिना जड़ो के काटा जाता है उसे “Scion” कहते है

रोपण की चार विधियाँ होती है कौन – कौन से होते है चलो उनके बारे में भी जान लेते है

  1. Whip/Tongue Grafting
  2. Wedge Grafting
  3. Crown Grafting
  4. Bud Grafting

Whip/Tongue Grafting –

जैसे कि आपको पता है रोपण में दो तने होते है जिसमे से एक जड़ से लगा होता है और दूसरा बिना जड़ के होता है इस विधि में दोनों तनों को तिरछे N के आकार में काट लिया जाता है उसके बाद दोनों तनों को जोड़ कर बांध दिया जाता है

Wedge Grafting –

इस विधि में दोनों तनों को V आकार में काट लिया जाता है उसके बाद तोनो तनों को जोड़ कर बांध दिया जाता है

Crown Grafting –

इस विधि में जड़ वाले तने के किनारे पर V आकार में काट लिया जाता है उसके दूसरे तने को उसमे जोड़कर बाँध दिया जाता है जिस तरह मुकुट में चारो तरफ से उठा दिखाई देता है उसी तरह इसमें भी दिखाई देता है इसलिए इसे “Crown Grafting” कहते है

Bud Grafting –

इस विधि में जड़ वाले तने में बीच में सीधा चीरा लगते है और उसमे जो दूसरा पतियों या कलिकाओ वाला तना होता है उसे चीरा में लगाकर बाँध दिया जाता है

दोस्तों हम लोगो ने अलैंगिक प्रजनन क्या है? (Asexual Reproduction in Hindi) के बारे में पूरी तरह से अध्ययन कर लिया है

दोस्तों आशा करता हूँ कि आपको अलैंगिक प्रजनन क्या है (Asexual Reproduction in Hindi) के बारे में दी गई जानकारी आपको पसंद आई होगी यदि यह जानकारी आपको पसंद आयी है तो प्लीज इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करे

यदि आपको कोई सुझाव देना है तो प्लीज कमेन्ट कीजिये

धन्यवाद   

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