प्रोटिस्टा जगत, वर्गीकरण, लक्षण, प्रोटोजोआ, जानिए A-Z

नमस्कार दोस्तों, क्या आप प्रोटिस्टा जगत के बारे में जानना चाहते है यदि हाँ तो आप बिलकुल सही पोस्ट पर आये है। आज हम आपको प्रोटिस्टा जगत क्या है? इसके बारे स्टेप बाई स्टेप बताएँगे तो चलिए शुरू करते है।

प्रोटिस्टा जगत क्या होता है? (What is Kingdom Protista in hindi?) – 

इस जगत में यूकैरियोटिक कोशिका वाले एकल कोशिकीय जीवो को रखा गया है। इनमे कोशिका भित्ति कुछ में ही होती है। इसमें केन्द्रक झिल्ली मिलती है। इनका पोषण की विधि मिश्रित होता है मतलब इनमे स्वपोषी और परपोषी दोनों होते है। इनमे प्रजनन की विधि युग्मक – संयुग्मन और संयुग्मन होता है।

प्रोटिस्टा जगत के लक्षण –

इस जगत में यूकैरियोट जीवो को रखा जाता है। मतलब जिनमे यूकैरियोटिक कोशिकाए पायी जाती है। और वे कोशिकाए जिनमे सुकेंद्रित केन्द्रक या केन्द्रक आवरण मिलता है उन्हें यूकैरियोटिक कोशिका कहते है। 

इस जगत में एकल कोशिकीय जीवो को रखा जाता है।

इस जगत में ज्यादातर जीव जलीय होते है और किस प्रकार के जल में मिलते है लवणीय जल में मिलते है। 

प्रॉटिस्टा जगत के जीव स्वपोषी और परपोषी दोनों प्रकार के होते है। यही नही इसमें मिश्रित पोषी भी होते है। मिश्रित पोषी का मतलब जब एक ही जीव के अन्दर स्वपोषी और परपोषी दोनों प्रकार का पोषण होता है तो उन्हें मिश्रित पोषी कहते है।  जैसे – यूग्लीना इसमें दोनों प्रकार का पोषण होता है।  

प्रोटिस्टा जगत का वर्गीकरण (Classification of Kingdom Protista) –

प्रॉटिस्टा जगत को पोषण के आधार पर तीन भागो में बाँटा गया है।

  1. स्वपोषी / प्रकाशसंश्लेषी प्रोटिस्ट
  2. उपभोक्ता (मृतोपजीवी) प्रोटिस्ट
  3. उपभोक्ता (परजीवी) प्रोटिस्ट

स्वपोषी / प्रकाशसंश्लेषी –

ऐसे जीव जो अपना भोजन स्वयं बनाते है दूसरे जीवो पर निर्भर नही होते है तो उन्हें स्वपोषी कहा जाता है। इन्हें तीन प्रकार के समूहों में रखा गया है।

  1. क्राइसोफाइट 
  2. डाईनोफ्लैजिलेट 
  3. यूग्लिनोइड 

उपभोक्ता (मृतोपजीवी) –

जो जीव अपने पोषण या भोजन के लिए दूसरो पर निर्भर होते है तो ऐसे जीव को उपभोक्ता कहते है। मृतोपजीवी का मतलब जो जीव सड़े – गले या मृत पदार्थो से पोषण प्राप्त करते है तो उन्हें मृतोपजीवी कहा जाता है। जीवाणु और कवक होते है वैसे ही प्रॉटिस्टा जगत में भी एक जीव है जिन्हें अवपंक कवक (Slime mould) कहा जाता है। तो इस समूह में अवपंक कवक को रखा गया है।

उपभोक्ता (परजीवी) –

इस समूह में प्रोटोजोआ को रखा गया है। और परजीवी का मतलब ऐसे जीव जो पोषण और आवास के लिए दूसरे जीवो पर आश्रित होते है परजीवी कहलाते है। जैसे जूँ, किलनी आदि।

क्राइसोफाइट –

  1. इसके अन्दर दो प्रकार के जीवो को रखा गया है। डाईएटम (Diatom) और सुनहरे शैवाल (Desmid), इसमें मुख्यरूप से हम डाईएटम के बारे में पढ़ेंगे।
  2. ये स्वच्छ जल और लवणीय जल में मिलते है ज्यादातर लवणीय जल में मिलते है।
  3. ये पादपप्लावक (Phytoplankton) है इसका मतलब ये स्वपोषी है और जल के सतह पर तैर रहे है।
  4. इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा भोजन क्राइसोफाइट बनाते है और इस क्राइसोफाइट में भी सबसे ज्यादा डाईएटम बनाते है इसलिए इन्हें मुख्य उत्पादक भी कहते है क्योकि यही सबसे ज्यादा प्रकाश संश्लेषण कर रहे है इस पृथ्वी पर।
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Diatom क्या होते है?
  1. इनकी कोशिका भित्ति जल में उपस्थित सिलिका को अवशोषित करके कठोर हो जाती है। इस कठोर कोशिका भित्ति को Frustule कहते है। यह फ्रयुस्टूल दो भागो से बना होता है। पहला ऊपरी भाग जिसे ऐपिथीका कहते है और दूसरा निचला भाग जिसे हाइपोथिका कहते है।
  2. इन्हें डाईएटम क्यों कहते है देखिये डाई का अर्थ 2 होता है और यहाँ पर एटम का अर्थ आवरण है अब ये दो आवरण ऐपीथीका और हाइपोथिका से मिलकर बने है इसलिए इन्हें डाईएटम कहा जाता है और इनकी संरचना साबुनदानी की जैसी होती है।
  3. ये Diatom जब मृत होते है तो ये समुद्र के आधार पर एकत्रित होते जाते है क्योकि इनपर किसी भी अम्ल, उच्च तापमान या प्रकाश का प्रभाव नही पड़ रहा था क्योकि इनकी कोशिका भित्ति बहुत कठोर थी। अब ये एकत्रित हो रही संरचना को डाईऐटमी मृदा या Diatomite कहते है।
diatom
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डाईऐटमी मृदा का उपयोग – 

  1. इसका उपयोग पेन्ट बनाने में किया जाता है। 
  2. टूथपेस्ट बनाने में किया जाता है। 
  3. लकड़ी का पालिश बनाने में किया जाता है।
  4. तेल बनाने में किया जाता है।
  5. भट्ठियो का दीवार बनाने में किया जाता है क्योकि इन पर उच्च तापमान का असर नही पड़ता है।
  6. ये डाईएटम प्रदूषक सूचक (Pollution indicator) की तरह काम करते है। प्रदूषक सूचक मतलब वो जल जिसके अन्दर प्रदूषनीय तत्व होगे तो वहां पर ये डाईएटम वृद्धि नही करेंगे। 

प्रदूषित जल किसे कहते है?

वह जल जिसके अन्दर घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है उसे प्रदूषित जल कहते है। अब जिस जल में ऑक्सीजन की मात्रा कम होगी वहां जीव जीवित रह पाएंगे नही न तो अगर ऐसे जल में डाईएटम को डाल दिया जाय तो वो भी जीवित नही रह पाएंगे तो इनसे हमें सूचना मिलती है कि ये जल प्रदूषित है इसलिए इन्हें प्रदूषक सूचक कहते है।

उदाहरण – ट्राईसिरेटम, नैविक्युला, सिमबैला आदि। 

अब दोस्तों हम पढ़ेंगे Dinoflagellates के बारे में।

Dinoflagellates क्या होते है?
  1. ये हरे, पीले, लाल, भूरे, नीले इन सभी रंग के होते है यानि कि इनके अन्दर जिस तरह का वर्णक होगा उसी रंग के होंगे। अगर लाल रंग का वर्णक होगा तो लाल होंगे, पीले रंग का होगा तो पीला होंगे।
  2. ये अधिकतर लवणीय जल या समुद्र में पाए जाते है।
  3. इनकी कोशिका भित्ति सेलुलोज और पेक्टिन से बनी होती है जिसके कारण कोशिका भित्ति बहुत ही कठोर हो जाती है। इस कठोर कोशिका भित्ति को लोरिका कहते है यह कवच या हथियार के रूप में काम करता है।
  4. ये द्विकशाभिकीय संरचना वाले होते है मतलब इनमे दो कशाभिका पाए जाते है इसी कारण इन्हें Dinoflagellates कहते है Dino का अर्थ दो और Flagellate का मतलब कशाभिका होता है।
  5. इनमे एक कशाभिका शरीर के लम्बवत होता है जिसे सलकस कहते है और एक शरीर के अनुप्रस्थ मिलता है जिसे ऐन्युलस कहते है।
Dinoflagellates, प्रोटिस्टा जगत

Note 1 – कुछ Dinoflagellate जैव संदीप्ति ( Bioluminescence) दर्शाते है मतलब रात के अँधेरे में जग मगाते है। जैसे – नोक्टिल्यूका, पाईरोडीनियम।

2. कुछ Dinoflagellates के कारण से समुद्र से लाल तरंगे आती है जिसे Red Tide कहते है। जैसे –  गोनियालैक्स, जीमनोडीनियम आदि 

अब दोस्तों हम पढ़ेंगे Euglenoid के बारे में तो इसे भी जान लेते है।

यूग्लेनोइड क्या होते है? What is Euglenoid in hindi?
यूग्लीना, euglena in hindi
  1. ये ज्यादातर साफ पानी में मिलते है।
  2. इनमें कोशिका भित्ति नही पायी जाती है लेकिन इसकी जगह पर लचीलीदार, प्रोटीन युक्त एक झिल्ली पायी जाती है जिसे Pellicle कहते है। 
  3. इनके अग्रभाग में एक अंतर्वलन होता है यानि अन्दर की तरफ मुड़ा होता है इस अंतर्वलन के अन्दर से दो कशाभिका निकले होते है जिसमे एक लम्बा होता है और एक छोटा होता है। इसी लम्बे कशाभिका से यूग्लिना तेजी से गति करता है।
  4. जहाँ से कशाभिका निकली होती है उस आधार के निकट एक संरचना पायी जाती है जिसे प्रकाश दृक बिंदु (Photosensitive Eye spot)  या Stigma कहते है इसका कार्य यूग्लिना को प्रकाश की तरफ ले जाना है।
  5. इनके अन्दर एक संकुचनशील धानी (Contractile vacuole) मिलती है जिसका काम जल की मात्रा को नियंत्रित रखना होता है यानि की अगर इनके अन्दर जल की मात्रा अधिक हो जाती है तो यह जल को बाहर निकाल देती है और अगर कम हो जाता है तो जल को संचित कर लेती है।
  6. यूग्लिना में प्रकाश संश्लेषी वर्णक मिलते है जैसे – क्लोरोफिल – a , क्लोरोफिल – b और जैन्थोफिल, और ये वर्णक उच्च पादपो में मिलते है।
  7. ये प्रकाशसंश्लेषण के बाद अपने भोजन को पैरामाइलोन स्टार्च के रूप में संचित करते है।
  8. इसका पोषण मिश्रित होता है मिश्रित का मतलब ये दिन में प्रकाश संश्लेषण करके अपना भोजन बनाते है जबकि रात में Diatom/Dinoflagellates का भक्षण करते है मतलब ये स्वपोषी और परपोषी दोनों है और जिसमे ये दोनों प्रकार का पोषण मिलता है उन्हें मिश्रित पोषी कहते है।
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अवपंक कवक क्या होते है?

ये मृतोपजीवी (Saprophytes) होते है।

ये ज्यादातर पीले रंग के मिलते है।

ये एकल कोशिकीय होते है। 

इनमे कोशिका भित्ति नही पायी जाती है।

इनमे नग्न जीवद्रव्य होता है। जो बहुकेंद्रिकीय होता है। और इसका नाम प्लाज्मोडियम है। 

अनुकूल परिस्थिति में ये अवपंक कवक पास – पास आकर एक कालोनी बना लेते है। अनुकूल परिस्थिति का मतलब इन्हें भोजन और जल पर्याप्त मात्रा में मिल रहा है।

प्रतिकूल परिस्थिति में ये अवपंक कवक एक दूसरे से दूर – दूर रहते है। और इस परिस्थिति में ये अपने जीवद्रव्य को सिकोड़ कर एक संरचना बनाते है जिसे फलनकाय कहते है। और इस जीव द्रव्य में सभी कोशिकांग उपस्थित होते है।

इनमे केन्द्रक बहुत सारे होते है यह मैंने आपको पहले ही बता दिया है अब इन प्रत्येक केन्द्रक के चारो ओर एन्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम और गोल्जीका्य मिलकर कोशिका झिल्ली का निर्माण कर देती है। उसके बाद ये कोशिका झिल्ली के ऊपर एक और आवरण निर्माण करते है जिसे कोशिका भित्ति कहते है।

अब प्रत्येक केन्द्रक एक नयी संरचना में बदल गयी है और इस संरचना को बीजाणु (Spore) कहते है। हम इस बीजाणु को एक नई कोशिका भी कह सकते है। अब फलनकाय के अन्दर ढेर सारे बीजाणु बनते जायेंगे जिसके कारण फलनकाय की झिल्ली फट जाएगी और सभी बीजाणु बाहर आ जायेगे।

अब ये बीजाणु जो बाहर आये है कैसी परिस्थिति में है प्रतिकूल परिस्थिति में है अब क्या ये बीजाणु इस परिस्थिति में मर जायेंगे, नही मरेंगे, क्यों क्योकि ये बीजाणु मजबूत कोशिका भित्ति से घिरे हुए है जो इनकी सुरक्षा करता है और जैसे ही ये अनुकूल परिस्थिति में आते है तो इनकी कोशिका भित्ति टूट जाती है और ये पोषण करने लगते है।

उसके बाद इनके जीवद्रब्य में केन्द्रक का विभाजन होता है जिससे इनमे बहुत से केन्द्रक हो जाते है जिसके फलस्वरूप ये बहुकेन्द्रकीय हो जाते है। यानि की पहले के जैसे प्लाजमोडियम में बदल जाते है।

प्रोटोजोआ क्या होते है? What is protozoa in hindi?

प्रोटोजोआ की खोज सबसे पहले वैज्ञानिक एन्टोन वान ल्युविन्होक ने की थी।

ये परजीवी (Parasite) होते है। या परभक्षी (Predator) हो सकते है। परभक्षी वे जीव होते है जो दूसरे जीवो को मारकर खाते है या पोषण प्राप्त करते है। परभक्षी कहलाते है।

प्रोटोजोआ का वर्गीकरण (Classification of Protozoa) –

प्रोटोजोआ को गमन अंगो (Locomotor organ) के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। यानि की जिस अंग से जीव गति करते है। 

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प्रोटोजोआ को चार भागो में बांटा गया है।

  1. Amoeboid protozoans
  2. flagellated protozoans
  3. Ciliated protozoans
  4. Sporozoans

अमीबीय प्रोटोजोआ –

  1. जैसा की आपको नाम से पता चल गया होगा कि इसमें कौन से जीव को रखा गया है। अमीबा को रखा गया है।
  2. इसमें चलने में सहायता करने वाले अंग को कूटपाद या Pseudopodia कहते है। कूट का मतलब आभासी, मतलब जिसका आकार बदलता रहता हो और पाद किसे कहते है – शरीर से बाहर निकली हुई संरचना को पाद कहते है।
  3. जैसे हमारे हाथ – पैर इन्हें विज्ञान की भाषा में अग्र पाद और पश्च पाद कहते है। अब हमारे हाथ – पैर की आकृति बदलती नही है लेकिन जब अमीबा को गमन करना होता है इनमें जो पाद निकलता है उसकी आकृति बदलती रहती है इसी कारण से इनके गमन अंग को कूटपाद कहते है।
  4. इनके गमन अंग चलने में ही नहीं भोजन पकड़ने में भी सहायता करते है।
  5. अमीबा स्वच्छ और समुद्री दोनों जल में पाए जाते है। गीली मिटटी में भी पाये जाते है।
  6. उदाहरण – अमीबा प्रोटियस, और एंटामीबा हिस्टोलिटिका। अमीबा प्रोटियस समुद्री जल में मिलता है और एंटामीबा हिस्टोलिटिका स्वच्छ जल (अलवणीय जल) में मिलता है। और इसके वजह से इंसानों में अमीबीय पेचिस होती है। 

कशाभिकीय प्रोटोजोआ –

  1. इस समूह के जीवो में गमन अंग कशाभिका होता है।
  2. इस समूह के ज्यादातर जीव रोग उत्पन्न करते है।
  3. उदाहरण –  ट्रीपैनोसोमा गैम्बिएन्स। ये एक परजीवी है जो सी-सी मक्खी (Tsetse fly) के लार में मिलते है। इसका बैज्ञानिक नाम Phlebotomus argentipes है और ये मक्खी जब किसी व्यक्ति को काटती है तो ट्रीपैनोसोमा गैम्बिएन्स उस व्यक्ति के अन्दर चला जाता है और जाकर के एक रोग उत्पन्न करता है जिसका नाम निद्रा रोग (Sleeping sickness) है।
  4. इस रोग में व्यक्ति सही से सो नही पाता है। बेचैनी रहती है नीद लगने का कोई टाइम ही नहीं रहता है उसका पूरा सोने का समय ही बिगड़ जाता है। 

पक्षमाभी प्रोटोजोआ (Ciliated Protozoa) –

  1. इसमें गमन अंग पक्षमाभ (Cilia) होता है। यह सिलिया जीव की गति कराने के साथ – साथ उसके आस – पास के वातावरण में उपस्थित पदार्थो की भी गति कराते है जैसे – भोजन आदि।
  2. उदाहरण – पैरामीशियम कोडेटम, यह पादप प्लावक और जंतु प्लावक को खाता है। यानि की यह परभक्षी होता है।
  3. ये द्विकेन्द्रकीय होते है। एक छोटा होता है जिसे लघु केन्द्रक कहते है यह समसूत्री विभाजन करता है और एक बड़ा केन्द्रक होता है जिसे दीर्घ केन्द्रक कहते है। यह असुत्री विभाजन करता है।

Sporozoans –

  1. इनमे गमन अंग नही होता है।
  2. ये वाहक के द्वारा गमन करते है। वाहक जल, हवा या कोई जीव भी हो सकता है। जैसे – प्लाजमोडियम जीव मादा एनाफिलिज मच्छर के द्वारा गमन करते है।
  3. ज्यादातर स्पोरोजोआ परजीवी होते है।
  4. उदाहरण – प्लाजमोडियम, इसकी खोज लेवरन ने की थी और इसकी वजह से मलेरिया रोग होता है जो मादा एनाफिलिज मच्छर के काटने से होता है। और यह सर रोनाल्ड रोस ने बताया था प्लाज्मोडियम मादा एनाफिलिज के लार में होता है।

प्लाज्मोडियम की मुख्यरूप से चार जातियां होती है।

  1. प्लाज्मोडियम वाइवेक्स 
  2. प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरम 
  3. प्लाज्मोडियम मलेरियाई 
  4. प्लाज्मोडियम ओवेल 

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर –

प्रोटिस्टा में कौन कौन से जीव आते हैं?

यूकैरियोटिक कोशिका वाले एकल कोशिकीय जीव आते है।

प्रोटिस्ट आमतौर पर कहां रहते हैं?

जल में रहते है।

प्रोटिस्टा के दो जीव समूहों के बीच की कड़ी है?

यूग्लीना

प्रोटिस्टा जगत को कितने भागों में बांटा गया है?

प्रॉटिस्टा जगत को पोषण के आधार पर तीन भागो में बाँटा गया है।

  1. स्वपोषी / प्रकाशसंश्लेषी प्रोटिस्ट
  2. उपभोक्ता (मृतोपजीवी) प्रोटिस्ट
  3. उपभोक्ता (परजीवी) प्रोटिस्ट

आशा करता हूँ दोस्तों आपको प्रोटिस्टा जगत के बारे में दी गई जानकारी पसंद आयी होगी। अगर पसंद आयी है तो इसे अपने सोशल प्लेटफोर्म पर भी शेयर कीजिये।

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