प्रतिरक्षा क्या है? परिभाषा, प्रकार, उदाहरण, जानें A-Z

दोस्तों क्या आप जानना चाहते हैं कि प्रतिरक्षा क्या है? यदि हां तो यह लेख सिर्फ आपके लिए ही है क्योंकि इस लेख में हम इसकी परिभाषा, प्रकार, बनना और उदाहरण के बारे में जानेंगे, तो चलिए बिना समय बर्बाद किया शुरू करते हैं।

Table of Contents

प्रतिरक्षा क्या है? What is Immunity in Hindi?

सबसे पहले हम जानते हैं कि प्रतिरक्षा का अर्थ क्या होता है, देखिये प्रति का मतलब Against और अगेंस्ट का मतलब होता है किसी के खिलाफ कार्य करना, किसके खिलाफ कार्य करना, बाहर से जो सूक्ष्म जीव हमारे शरीर के अंदर आ रहे हैं जिन्हें हम प्रतिजन (Antigens) कहते हैं। इस तरह उनके खिलाफ कार्य करने के लिए शरीर में एक तंत्र मिलता है जो हमारे शरीर की रक्षा करता है जिसे प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) कहते हैं। इस प्रोसेस को प्रतिरक्षा (Immunity) कहते हैं।

अगर हम सरल भाषा में बात करें तो हमारे शरीर के अंदर जो बाहरी सूक्ष्म जीव आते हैं उनसे हमारा शरीर कैसे लड़ता है और उन्हें कैसे मार गिराता है यही हमारी प्रतिरक्षा कहलाती है। या शरीर का रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता प्रतिरक्षा कहलाती है।

प्रतिरक्षा क्या है, What is immunity in hindi
प्रतिरक्षा क्या है?

प्रतिरक्षा हमारे शरीर में कौन बनाता है?

देखिए हमारे शरीर में रक्त मिलता है। यह तो आप सभी जानते हैं। इस रक्त में तीन तरह के कोशिकाएं मिलती हैं। RBC, WBC और प्लेटलेट्स।

अब RBC और प्लेटलेट्स यह दोनों लड़ने का काम नहीं करती है लेकिन WBC जो होता है जिसे हम White Blood Corpurcles कहते हैं यही लड़ने का काम करता है। 

अब बात आती है कि यह तीनों RBC, WBC और प्लेटलेट्स बनती कहां है। देखिए आपने अस्थि (Bone) नाम तो सुना ही होगा इस अस्थि के अंदर में एक संरचना मिलती है, जिसे अस्थि मज्जा (Bone marrow) कहते हैं। अब आप सोचेंगे कि इस अस्थि मज्जा के अंदर होता क्या है तो मैं आपको बता दूं कि इसके अंदर एक प्रकार के कोशिका होती है जिन्हें Pluripotent Stem Cell कहा जाता है।

यह जो कोशिका है इस कोशिका के आगे एक शब्द आ रहा है Stem cell, यह स्टेम सेल होता क्या है। तो ऐसी कोशिकाएं जिनका कार्य दूसरी कोशिकाओं में परिवर्तित हो जाना होता है या एक अविभेदित कोशिकाएं होती हैं जो दूसरी कोशिकाओं में परिवर्तित होती हैं उन्हें Stem cell कहा जाता है।

अब बात करते हैं प्लूरिपोटेंट स्टेम सेल के बारे में यह सेल दो प्रकार के कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है।

  1. Myeloid Stem Cell
  2. Lymphoid Stem Cell

Myeloid Stem Cell –

यह कोशिका आगे विभाजित होकर RBC, प्लेटलेट्स, Monocytes, Neutrophills, Besophills और Eosinophills कोशिकाओं में परिवर्तित होती है।

हम लोगों ने पहले ही बात की है कि WBC हमारे शरीर में लड़ने का काम करती है। यह WBC दो प्रकार की होती है।

  1. कणिकामय (Granulocytes)
  2. अकणिकामय (Agranulocytes)

कणिकामय (Granulocytes) :-

ये ऐसी कोशिकाएं होती हैं जिनके अंदर कुछ विशेष प्रकार के प्रोटीन के कण मिलते हैं तो ऐसी कोशिकाओं को कणिकामय कोशिका कहा जाता है। यह तीन प्रकार की होती है।

  1. Neutrophils- यह WBC हमारे शरीर में सबसे अधिक 60-65% मिलती है। यह मुख्य रूप से भक्षण करने का कार्य करती है यानी कि मारने का काम करती है।
  2. Besophills – यह 0.5-1% मिलती है। यह सबसे कम मिलती है। यह भी भक्षण करने का काम करती है।
  3. Eosinophils – यह 2-3% मिलती है। यह मुख्य रूप से एलर्जी से संबंधित होती है।

अकणिकामय (Agranulocytes) :-

इन कोशिकाओं के अंदर प्रोटीन के कण नहीं मिलते हैं इसलिए इन्हें अकणिकामय कोशिकाएं कहा जाता है। यह दो प्रकार की होती है।

  1. मोनोसाइट्स (Monocytes)
  2. लसिकाणु (Lymphocytes)
Monocytes –

यह 6-8% मिलती है। यह कोशिका भी हल्का फुल्का भक्षण करने का कार्य करती है।

लसिकाणु (Lymphocytes)

यह 20-25%मिलती है। यह WBC सबसे महत्वपूर्ण होती है। महत्वपूर्ण इसलिए होती है क्योंकि यह शरीर में आए हुए प्रतिजन का पहचान करती है। अब आप ही सोचिए कि अगर आपके शरीर में कोई आया तो आप पहले उसकी पहचान करना जरूरी समझेंगे या मारना जरूरी समझेंगे। मान लेते हैं आपके शरीर में जो आ रहा है वह लाभदायक हुआ तो और अगर आपने उसे मार दिया तो। तो मेरे हिसाब से आपको इतनी बात समझनी पड़ेगी कि कौन लाभदायक है, कौन हानिकारक है और यह पहचान कौन करेगा हमारा लिंफोसाइट्स

अब आप ही सोचो कि इन पांचो WBC में से कौन इंपॉर्टेंट है अरे भाई जब तक पहचानेगा नहीं तब तक मारेगा कैसे, क्या शरीर के नॉर्मल कोशिकाओं को मारने लग जाएंगे नहीं ना। तो महत्वपूर्ण क्या है पहले पहचानो उसके बाद मारो। सोचिए अगर पहचान करने वाली कोशिका नहीं होती सिर्फ मार गिराने वाली कोशिका होती तो यह हमारे शरीर के संक्रमित कोशिका को मार देती चलो यहां तक तो ठीक था लेकिन जो असंक्रमित कोशिका थी उन्हें भी मार गिराती इस तरह तो जीव खत्म हो जाता। तो सबसे इंपॉर्टेंट क्या है पहचान करना उसके बाद मार गिराना।

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अब अगर आपको इतनी बात समझ में आ गई है तो WBC में मुख्य कोशिका कौन है लिंफोसाइट कोशिकाएं है। अब आप जरा सोचिएगा कि हमारे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र निर्माण करने का सबसे महत्वपूर्ण कोशिका कौन सी है लिंफोसाइट और यह जहां बनेंगी, परिपक्व होगी जहां पहुंचाई जायेंगी और जहां स्टोर होयेंगी हमारे शरीर में वे सभी अंग लसिकाभ अंग (lymphoid organ) कहलाएंगे।

Lymphoid Stem Cell –

यह कोशिका विभाजित होकर लिंफोसाइट कोशिका में परिवर्तित हो जाती है।

RBC, प्लेटलेट्स, WBC (Monocytes, Neutrophils, Basophils Eosinophils और Lymphocytes) इन सभी कोशिकाओं को रक्त कोशिका (Blood cells) कहते हैं। इन रक्त कोशिकाओं का निर्माण कहां होता है अस्थि मज्जा में होता है और इस निर्माण प्रक्रिया को हेमेटोपोइसिस (Hematopoiesis) कहा जाता है।

Lymphoid Organ –

इस लिंफाइड अंग को दो श्रेणियां में बांटा गया है।

  1. प्राथमिक लिंफाइड अंग (Primary Lymphoid Organ)
  2. द्वितीय लिंफाइड अंग (Secondary Lymphoid Organ) 
प्राथमिक लसीकाभ अंग किसे कहते हैं?

वे लसिकाभ अंग जहां पर लसिकाणु बनते हैं और परिपक्व होते हैं तो ऐसे लसिकाभ अंग को प्राथमिक लसिकाभ अंग कहा जाता है। हमारे शरीर में दो प्राथमिक लसीकाभ अंग पाए जाते हैं।

  1. अस्थि मज्जा
  2. Thymus ग्रंथि 
अस्थि मज्जा (Bone marrow) –

सभी लसिकाणु यहीं पर बनते हैं लेकिन सभी यही परिपक्व नहीं होते हैं कुछ यहां से थायमस ग्रंथि में परिपक्व होने के लिए चले जाते हैं और कुछ यहीं पर परिपक्व होते हैं। इसलिए इन दोनो को प्राथमिक लसिकाभ अंग कहा जाता हैं। इस अस्थि मज्जा में जो लिम्फोसाइट बनते हैं और यहीं परिपक्व होते हैं उन्हें B-लिंफोसाइट कहा जाता है।

थायमस ग्रंथि (Thymus Gland) –

यह ग्रंथि हृदय के ऊपर और उरोस्थि के नीचे स्थित होता है। यह जन्म के समय काफी बड़ा होता है लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है यह छोटी होती चली जाती है। इसमें जो लिंफोसाइट्स परिपक्व होते हैं उन्हें T- लिंफोसाइट्स कहा जाता है।

द्वितीय लसिकाभ अंग किसे कहते हैं?

जब लसिकाणु परिपक्व होने के बाद शरीर के दूसरे अंगों में जाकर बैठ जाते हैं और आने वाले प्रतिजन का पहचान करते हैं तो ऐसे लसिकाभ अंगों को द्वितीय लसिकाभ अंग कहा जाता है।

द्वितीय लसिकाभ अंग कौन-कौन से होते हैं?

प्लीहा (Spleen), लसिका ग्रंथियां (Lymphatic Node), टॉन्सिल्स, और छोटी आंत के पेयर पैचों होती हैं।

प्लीहा (Spleen) –

दोस्तों यह सेम के आकार का एक अंग है जो बैगनी कलर का होता है। यह डायाफ्राम और fundus के बीच में स्थित होता है। प्लीहा को RBC का कब्रिस्तान (Graveyard of RBC) और ब्लड बैंक भी कहा जाता है। इसका मतलब क्या है चलिए इसे भी जानते हैं। दोस्तों शायद आप जानते होंगे कि हमारे RBC का जीवनकाल औसतन 120 दिन होता है।

अब ऐसा तो है नहीं की आरबीसी 120 दिन बाद एकदम से नष्ट हो जाएगी हां उसकी मृत्यु हो जाएगी लेकिन नष्ट तो हो नहीं जाएगी तो इन मृत आरबीसी का क्या होगा देखिए जब यह RBC मर जाती है तब भी यह रक्त नलिकाओं में तैरती रहती है और तैरते – तैरते यह प्लीहा में पहुंच जाती है और प्लीहा में पहुंचने के बाद इनका भक्षण किया जाता है। इसलिए प्लीहा को RBC का कब्रिस्तान कहा जाता है। इनका भक्षण कौन करता है जो बेसोफिल्स कोशिकाएं होती है इनका जीवनकाल बहुत ही छोटा होता है इसलिए यह भक्षण कोशिकाओं में बदल जाती है जिन्हें मैक्रोफेज कहा जाता है और यही मृत आरबीसी का भक्षण करती है।

यह मैक्रोफेज भी दो प्रकार की होती है एक वो होती है जो हमारे रक्त में बहती रहती है और एक वह होती है जो हमारे शरीर के अंगों में जाकर एकत्रित हो जाती है। जो अंगों में जाकर एकत्रित होती है उनका कुछ उदाहरण बता देता हूं। जैसे – Kuffer cells जो यकृत में जाकर एकत्रित होती है। इसी तरह जो हमारे अस्थियों में मैक्रोफेज एकत्रित होती है उन्हें ओस्टियोक्लास्ट (Osteoclast) कहा जाता है जो हमारे दूध के दांत गिरते हैं ना उसके जिम्मेदार ये ओस्टियोक्लास्ट ही होते हैं।

प्लीहा को ब्लड बैंक क्यों कहते हैं?

दोस्तों जब हमारे शरीर में जरूरत से ज्यादा RBC बन जाता है। तो इस एक्स्ट्रा RBC को प्लीहा स्टोर कर लेता है इसलिए इसे ब्लड बैंक कहा जाता है। अब आप ही सोचो कि हमारा प्लीहा कितना जबरदस्त काम कर रहा है एक तो मरे हुए आरबीसी को नष्ट कर रहा है और दूसरा एक्स्ट्रा आरबीसी को स्टोर भी कर रहा है दो-दो काम कर रहा है।

चलिए अब बात करते हैं कि यह हमारा द्वितीय लसिकाभ अंग कैसे है। देखिए मान लेते हमारे शरीर में कोई बाहरी प्रतिजन या सूक्ष्म जीव आया और वह रक्त में चला गया और फिर बहते – बहते प्लीहा में पहुंच गया अब प्लीहा में परिपक्व लसिकाणुओ को भेजा गया है जो वहां पहले से मौजूद हैं अब यह लसिकाणु सूक्ष्मजीवों को पहचान लेंगे और इसी प्लीहा में भक्षाणु कोशिका भी  बैठे हैं और ये सूक्ष्म जीवों का भक्षण कर लेंगे। तो प्लीहा क्या है द्वितीय लसिकाभ अंग हैं क्योकि इसमें परिपक्व लासिकाणु भेजे गए है।

लासिका ग्रंथियां (Lymph node) –

दोस्तों लसीका ग्रंथियां छोटे-छोटे ठोस संरचनाएं होती हैं जो लसीका नलिका के भिन्न-भिन्न जगहों पर स्थित होती है। इन छोटे- छोटे ठोस रचनाओं के अंदर लसिकाणु और भक्षाणु कोशिकाएं उपस्थित होती है। देखिए हमारे शरीर के अंदर दो तरह के तरल बहते हैं एक तो रक्त होता है दूसरा लसिका होता है। तो जब इस लसिका के अंदर कोई प्रतिजन या सूक्ष्म जीव आ जाते हैं तो लसिका ग्रंथि में उपस्थित लसिकाणु और भक्षाणु कोशिकाए मिलकर उन्हें मार देती है।

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MALT (Mucosa Associated Lymphoid Tissue)-

दोस्तों हमारी छोटी आंत चार स्तर से मिलकर बनी होती है और जो सबसे अंदर वाली स्तर होती है उसे Mucosa कहते हैं। इससे लसीका ऊतक जुड़ी होती है या मिली होती है जिसका नाम पेयर पैचेस है। हमारे शरीर में MALT लसीका ऊतक का लगभग 50% भाग होता है। 

प्रतिरक्षा कितने प्रकार की होती है?

प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है।

  1. सहज प्रतिरक्षा (Innate immunity)
  2. उपार्जित प्रतिरक्षा (Acquired immunity)

सहज प्रतिरक्षा क्या हैं? What is innate immunity in hindi?

ऐसी प्रतिरक्षा जो हमें जन्मजात मिलती है उसे सहज प्रतिरक्षा कहते हैं। यह एक अविशिष्ट प्रतिरक्षा है। अविशिष्ट का मतलब यह पर्टिकुलर किसी विशेष सूक्ष्मजीवो को रोकने का काम नहीं करती है। यह एक प्रकार के रोधक का काम करती है।

जैसे – त्वचा, आमाशय में HCl अम्ल, आहार नाल में श्लेष्मा, नाक में श्लेषमा, लार मैं उपस्थित लाइसोजाइम एंजाइम, आंखों में आसूं। यह सभी रोगाणुओं को रोकती हैं नष्ट करती हैं गतिहीन करती हैं और यह सभी हमें जन्मजात मिलती है ना कि इसे हम जन्म होने के बाद अर्जित करते हैं।

सहज प्रतिरक्षा के प्रकार कितने प्रकार के होते हैं?

यह चार प्रकार के होते हैं

  1. शारीरिक रोधक (Physical barrier)
  2. कायिकीय रोधक (Physiological barrier)
  3. कोशिकीय अवरोधक (Cellular barrier)
  4. साइटोकाइन अवरोधक (Cytokine barrier)

शारीरिक रोधक (Physical barrier) :- इस रोधक की बात करें तो हमारे शरीर पर जो त्वचा यह मुख्य रोधक है यह सूक्ष्म जीवों को अंदर जाने से रुकती है। यदि फिर भी कोई सूक्ष्म जीव हमारे शरीर के अंदर प्रवेश करता है तो हमारे शरीर में श्लेष्मा जो है उस सूक्ष्म जीव को फंसा कर गतिहीन कर देती है। क्योंकि श्लेष्मा एक गाढ़ा तरल होता है।

कायिकीय रोधक (Physiological barrier) :- हमारे शरीर में जो क्रियाएं चल रही है जैसे श्वसन क्रिया, पाचन क्रिया, परिसंचरण क्रिया, तंत्रिका तंत्र में संवेदना ग्रहण करने की क्रिया, अंतः स्रावी क्रिया आदि यह सभी क्रियाएं या क्रिया प्रणाली जो हमारे शरीर के अंदर चल रही है इन्हें फिजियोलॉजी कहते हैं। जब इन्ही फिजियोलॉजिकल एक्टिविटीज में कोई अवरोधक होती है तो उसे  कायिकीय रोधक या फिजियोलॉजिकल बैरियर कहते हैं। जैसे मुख में लार, आमाशय में अम्ल, आंखों में आंसू। यह सभी रोगाणुओ के वृद्धि को रोकते हैं।

कोशिकीय अवरोधक (Cellular barrier) :- WBC कि कुछ कोशिकाएं जो हमें जन्मजात मिलती हैं और यह रोगाणुओं का भक्षण करने का काम करती हैं। जो यह हैं neutrophils, monocytes, basophils- macrophase, natural killer cells।

साइटोकाइन अवरोधक (Cytokine barrier) :- हमारे शरीर में जो कोशिकाएं विषाणु से संक्रमित होती है वह कोशिकाएं इंटरफेरॉन नामक एक रसायन निकालती है जो प्रोटीन के अणु होते है। यह रसायन संक्रमित कोशिकाओं से निकलकर असंक्रमित कोशिकाओं के पास जाती है और उन्हें एक संदेश देती है कि वायरस का अटैक हुआ है। आप लोग वायरस से लड़ने के लिए तैयार हो जाओ जिससे नई कोशिकाएं संक्रमित होने से बच जाती है। यह इंटरफेरॉन नामक रसायन एंटीवायरस होता है और हमें जन्मजात मिलता है।

उपार्जित प्रतिरक्षा क्या हैं? (What is acquired immunity in hindi?)

ऐसी प्रतिरक्षा जो हम जन्म के बाद अर्जित या पैदा करते हैं उसे उपार्जित प्रतिरक्षा कहते हैं। यह विशिष्ट प्रतिरक्षा होती है यानी की पर्टिकुलर किसी विशेष रोगाणुओं को मारने का काम करती हैं। इनका मुख्य लक्षण इनकी मेमोरी होती है।

उपार्जित प्रतिरक्षा का निर्माण लिंफोसाइट कोशिका करती है। लिंफोसाइट दो प्रकार की होती हैं।

  1. B लिम्फोसाइट
  2. T Lymphocytes

B लिम्फोसाइट और T लिम्फोसाइट –

B लिंफोसाइट इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह बोन मैरो में बनती हैं और वहीं परिपक्व होती हैं। परिपक्व होने के बाद जब यह द्वितीय लसिकाभ अंगों में जाती हैं तो यह दो प्रकार की कोशिका में विभाजित हो जाती हैं। Plasma B cell और Memory B Cell। टी लिंफोसाइट बनते तो बोन मैरो में ही है लेकिन परिपक्व थाइमस ग्रंथि में होते हैं इसलिए इन्हें T लिंफोसाइट कहा जाता है। यह चार प्रकार की होती हैं।

T helper, T Killer, T Suppressor संदमक कोशिका, और T memory। अब यह टी हेल्पर कोशिका जो होती है यह प्लाज्मा बी सेल को एंटीबॉडी/ प्रतिरक्षी बनाने के लिए प्रेरित करती है। देखिए जब बच्चा पैदा होता है तब उसे टीका लगाया जाता है। उस टीके में निष्क्रिय रोगाणु होते हैं लेकिन शरीर को नहीं पता होता है कि यह निष्क्रिय रोगाणु है और वह तुरंत एक्शन लेता है और टी हेल्पर कोशिका एंटीबॉडी बनाने के लिए प्लाज्मा B सेल को प्रेरित/ सहायता करती है।

उसके बाद प्लाज्मा B सेल ढेर सारी एंटीबॉडीज बनाती हैं उसके बाद एंटीबॉडी से निष्क्रीय रोगाणु का पहली बार मुठभेड़ होता है जिसे फर्स्ट एनकांउटर भी कहते हैं और रोगाणु को नष्ट कर दिया जाता है। और यह सभी इनफॉरमेशन मेमोरी कोशिकाओं (Plasma B Memory and T memory) के पास स्टोर हो जाती है ताकि अगर दोबारा से कभी भी सक्रिय रोगाणु आए तो उसे आसानी से और तेजी से उसी एंटीबॉडीज से मार सकें। इसलिए इनका मुख्य लक्षण मेमोरी होता है।

प्रतिरक्षी किसे कहते हैं? (What is antibody in hindi?)

यह एक प्रकार के प्रोटीन होते हैं और प्रोटीन पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला से बने होते हैं। इसमें चार पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला होती है। जिसमें से दो बड़ी और दो छोटी पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला होती है। जो दो बड़ी श्रृंखलाएं हैं उनका भार भारी/ havy होगा और जो छोटी है उनका भार हल्का/ lite होगा। जिसे हम H2 और L2 से दर्शाते हैं। दो छोटी श्रृंखला को लघु श्रृंखलायें कहते हैं और दो बड़ी श्रृंखलाको दीर्घ श्रृंखलायें कहते हैं।

दोनों हैवी आपस में जुड़े होते हैं और दोनों हल्की श्रृंखला दोनों भारी श्रृंखला से जुड़ी होती है। यह जिस बंध से जुड़ी होती है उसे डाई सल्फाइड बंध कहते हैं। जैसे- H-H और H-L

प्रतिरक्षी कितने प्रकार के होते हैं?

प्रतिरक्षी कुल पांच प्रकार के होते हैं।

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IgD, IgE, IgM, IgA और IgG जहाँ D = Delta, E = Epsilon, M= Macro, A= Alpha, G = Gamma

Antibody, antibodies
प्रतिरक्षी (Antibodies)

IgG, IgE, और IgD यह तीनों एकल इकाई से बने होते हैं और IgA दो इकाई से बनी होती है। और दोनों इकाई जॉइनिंग चेन से जुड़ी होती है। IgM पांच इकाइयों से मिलकर बनी होती है और यही IgM पांचों में सबसे बड़ी प्रतिरक्षी है। हमारे शरीर में सबसे ज्यादा प्रतिरक्षी IgG मिलती है। IgA प्रतिरक्षी हम सभी को अपने मम्मी के प्रथम दुग्धपान के द्वारा मिलता है जिसे हम कोलेस्ट्रम या खीस कहते हैं। अपरा या प्लेसेंटा से भी हमें IgG प्रतिरक्षी मिलती है। IgE प्रतिरक्षी एलर्जी के लिए रिस्पांसिबल होती है।

ये प्रतिरक्षी काम कैसे करते हैं दोस्तों यह प्रतिरक्षी हमारे रक्त में घूमते रहते हैं हमारे तरल में घूमते रहते हैं और जब कोई प्रतिजन आता है तो इनका जो सक्रिय भाग होता है वह प्रतिजन से जुड़ जाता है जुड़ने के बाद यह प्रतिरक्षी उनके स्ट्रक्चर में परिवर्तन कर देते यानी कि उन्हें निष्क्रीय कर देते हैं उसके बाद भक्षण कोशिका इन्हें नष्ट कर देते हैं।

प्रतिरक्षा अनुक्रिया क्या है? (What is immune response in hindi?)

जब हमारे शरीर में कोई प्रतिजन आता है तो उसके खिलाफ हमारा शरीर काम/रेस्पॉन्स कैसे करता है इसे ही प्रतिरक्षा अनुक्रिया कहते हैं। यह दो प्रकार की होती है।

  1. तरल प्रतिरक्षा अनुक्रिया (Humoral Immune Response)
  2. कोशिका मध्यित प्रतिरक्षा अनुक्रिया (Cell mediated Immunity)
तरल प्रतिरक्षा अनुक्रिया (Humoral Immune Response)

दोस्तों लिंफोसाइट दो प्रकार के होते हैं। B लिंफोसाइट और T लिंफोसाइट यह मैंने आपको पहले ही बता रखा है तो जो B लिंफोसाइट हैं यह हमारे शरीर के तरल में सबसे अधिक मात्रा में घूमती रहती हैं। अब हम मुख्य रूप से रक्त की बात कर रहे हैं। अब आप ही सोचिए अगर हमारे शरीर में कोई रोगाणु आता है और वह हमारे रक्त में घुस जाता है तो कौन सा प्रतिरक्षा या कोशिकाएं उसके प्रति सबसे ज्यादा रेस्पॉन्ड करेगी या अनुक्रिया करेगी तो इस रक्त के अंदर या तरल के अंदर पाए जाने वाली B लिंफोसाइट कोशिका अनुक्रिया करेगी तो ऐसी अनुक्रिया तरल प्रतिरक्षा अनुक्रिया कहलाती है।

कोशिका मध्यित प्रतिरक्षा अनुक्रिया (Cell mediated Immunity) :-

हमारे अंगों में अधिक मात्रा T लिंफोसाइट कोशिका स्थापित होती है और जब हमारे शरीर में किसी अंग का ट्रांसप्लांट या प्रत्यारोपण होता है तो उस समय टी लिंफोसाइट कोशिका रेस्पॉन्ड या अनुक्रिया करती है तो ऐसी अनुक्रिया को कोशिका मध्यित प्रतिरक्षा अनुक्रिया कहते हैं।

अब यह प्रश्न उठता है कि इस तरह तो अंगों का ट्रांसप्लांट हो ही नहीं पाएगा लेकिन ट्रांसप्लांट होता तो है तो कैसे होता है देखिए जब अंगों का ट्रांसप्लांट किया जाता है तो उस समय उस कअंग के क्षेत्र में एक प्रतिरक्षा संदमक (immunosuppressant) रसायन डाला जाता है जिससे कोशिका मध्यित प्रतिरक्षा अनुक्रिया बंद हो जाता है और शरीर उस बाहरी अंग को एक्सेप्ट कर लेता है। उस रसायन का नाम साइक्लोपोरिन -A है। यह रसायन एक कवक से मिलता है जिसका नाम Trichoderma polyporum है।

उपार्जित प्रतिरक्षा कितने प्रकार का होता है?

यह दो प्रकार का होता है।

  1. सक्रिय प्रतिरक्षा (Active Immunity)
  2. निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Passive Immunity)

सक्रिय प्रतिरक्षा क्या है? (What is active immunity in hindi?)

जब हमारा शरीर स्वयं एंटीबॉडीज बनाता है तो इसे हम सक्रिय उपार्जित प्रतिरक्षा कहते हैं। यह प्रतिरक्षा धीमी गति से होती है और ज्यादा समय तक बनी रहती है। यह दो प्रकार की होती है।

प्राकृतिक सक्रिय प्रतिरक्षा क्या है?

जब हमारा शरीर बिना किसी टीकाकरण के प्राकृतिक रूप से किसी रोगाणु के खिलाफ अपनी आप प्रतिरक्षी बना लेता है तो उसे हम प्राकृतिक सक्रिय प्रतिरक्षा कहते हैं।

कृत्रिम सक्रिय प्रतिरक्षा क्या है?

जब हमारे शरीर का टीकाकरण किया जाता है उसके बाद हमारा शरीर उसे रोगाणु के खिलाफ प्रतिरक्षी बनाता है तो इसे हम कृत्रिम सक्रिय प्रतिरक्षा कहते हैं। क्योंकि टीका मनुष्य द्वारा बनाया जाता है।

निष्क्रिय प्रतिरक्षा क्या है? (What is passive immunity in hindi?)

जब हमारा शरीर बना बनाया बाहर से एंटीबॉडीज लेता है तो इसे हम निष्क्रिय उपार्जित प्रतिरक्षा कहते हैं। यह प्रतिरक्षा तेज गति से होती है और कम समय तक बनी रहती है। यह दो प्रकार की होती है।

प्राकृतिक निष्क्रिय प्रतिरक्षा क्या है? (What is natural passive immunity in hindi?)

जब बच्चा जन्म लेता है तो उसकी मम्मी द्वारा प्रथम बार जो दुग्ध पान कराया जाता है उस दुग्ध में IgA प्रतिरक्षी मिलती है जो बच्चे की 3 महीने तक सुरक्षा करती है। इसी तरह जब बच्चा गर्भ में भ्रुणीय अवस्था में होता है तब प्लेसेंटा के द्वारा बच्चों को मां से IgG प्रतिरक्षी मिलती है। अब आप ही सोचिए कि यह दोनों प्रतिरक्षी प्राकृतिक रूप से मम्मी से बनी बनाई बच्चों को मिलती है कि नहीं मिलती है ना तो ऐसे प्रतिरक्षा को प्राकृतिक निष्क्रिय प्रतिरक्षा कहते हैं।

उदाहरण – IgA और IgG प्रतिरक्षी।

कृत्रिम निष्क्रिय प्रतिरक्षा क्या है? (What is artificial passive immunity in hindi?)

आप लोगों ने टिटनेस नाम तो सुना ही होगा। यह एक रोग है जो Clostridium tetani नामक बैक्टीरिया से होता है। वैज्ञानिकों ने एक एक्सपेरिमेंट किया जिसमें उन्होंने इस बैक्टीरिया को लेकर मानव और घोड़े के अंदर डाल दिया। जब यह बैक्टीरिया मानव के अंदर गया तो उसे टिटनेस नामक एक रोग हो गया और घोड़े के अंदर जाने के बाद घोड़े को कुछ नहीं हुआ क्यों नहीं हुआ क्योंकि घोड़े का प्रतिरक्षा इस बैक्टीरिया के खिलाफ प्रतिरक्षी बना रहा था यानी की घोड़े की प्रतिरक्षा काम कर रहा था जबकि मानव के अंदर इस बैक्टीरिया के खिलाफ प्रतिरक्षी नहीं बन पा रहा था यानी कि मानव का प्रतिरक्षा इसके खिलाफ एंटीबॉडीज नहीं बन पा रहा था।

तब वैज्ञानिकों ने घोड़े का रक्त निकाला और उसमें से थक्का बनाने वाले कारक को निकाल दिया और बची हुई तरल को स्टोर कर लिया इस तरल को सीरम कहा जाता है अब इस तरल में सिर्फ प्रतिरक्षी होते हैं। अब हम इस सीरम को किसी भी मनुष्य के अंदर डाल सकते हैं जिससे उस मनुष्य को टिटनेस नामक बीमारी नहीं होगी क्योंकि इस सीरम में उनके खिलाफ लड़ने के लिए प्रतिरक्षी होते हैं।

अब आप ही सोचिए कि मानव ने इस प्रतिरक्षी को बनाया है तो यह कैसा हुआ कृत्रिम हुआ और यह बना बनाया किसी मानव के अंदर डाला जा रहा है तो ऐसी प्रतिरक्षा को कृत्रिम निष्क्रिय प्रतिरक्षा कहते हैं। आपके दिमाग में एक प्रश्न उठ रहा होगा कि हमने घोड़े के रक्त में से थक्का बनाने वाले कारक को क्यों निकाला तो दोस्तों आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि यदि हम किसी एक प्रजाति के जीव का रक्त किसी दूसरे प्रजाति के जीव के अंदर डालते हैं तो वह रक्त थक्का बना देगा जिससे उस जीव की मृत्यु हो जाएगी तो इससे बचने के लिए हम लोगों ने थक्का बनाने वाले कारक को ही निकाल देते हैं।

उदाहरण –  Anti Tetanus Serum

एलर्जी क्या है? आगे पढ़ें ..

निष्कर्ष –

दोस्तों आशा करता हूं आपको यह लेख प्रतिरक्षा क्या है के बारे में दी गई जानकारी पसंद आई होगी और यह आपके लिए हेल्पफुल भी रहा होगा यदि यह लेख आपको पसंद आई है तो इसे अपने दोस्तों के साथ और फेसबुक ग्रुप, व्हाट्सएप ग्रुप में भी शेयर कीजिए।

धन्यवाद

 

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